तो इस वजह से चीन नहीं कर सकता भारत पर हमला

जहाँ एक तरफ चीन भारत को धमकाने से बाज नहीं आ रहा वही दूसरी तरफ भारत का मानना है की चीन भारत पर हमला नहीं कर सकता। भारतीय थिंक टैंक और रक्षा विशेषज्ञ की माने तो भारत चीन के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। चीन अगर दुनिया का सबसे बड़ा निर्माता है तो भारत दुनिया का सबसे बड़ा खरीददार और अगर चीन को दुनिया की वैश्विक शक्ति के रूप मे उभारना है तो उसको भारत की ही ज़रूरत पड़ेगी। भारत और चीन के बीच करीब 6500 करोड़ डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है। चीन भारत से युद्ध कर के अपने आप को आर्थिक रूप से कमजोर नहीं करना चाहेगा।

तो इस वजह से चीन नहीं कर सकता भारत पर हमला

आर्थिक नुकसान: भारत आज दुनिया की नज़र मे एक बहुत बड़ा बाजार है और यह बात चीन भी बखूबी समझता है। भारत विश्व के बाजार मे 40 फीसदी की हिस्सेदारी रखता है। चीन को अपने आप को आर्थिक रूप से संपन्न बनाये रखना एक बहुत बड़ा मुद्दा है। अगर चीन और भारत के बीच युद्ध होता है तो यह भारत के लिए तो नुकसानदायक होगा ही मगर चीन पर इस नुक्सान का असर कई गुना ज़्यादा होगा।

चीन का भारत मे बढ़ता निवेश: बीते 3 सालो मे (एफडीआई) के माध्यम से चीन का भारत मे निवेश कई गुना बढ़ा है। चीन की सैंकड़ो कंपनिया भारत मे काम कर रही है। चीन और भारत के बीच युद्ध इन कंपनियों पर ताला लगाने के लिए एक बड़ी वजह होगी जो चीन कभी नहीं चाहेगा।

वर्ल्ड पावर बनने का लालच: चीन एक अति-महत्वकांशी देश है। चीन को वर्ल्ड पावर बनने का लालच उसको युद्ध की इजाजत नहीं देता। चीन भली-भांति समझता है की आज के युग मे युद्ध से वर्ल्ड लीडर नहीं बना जा सकता और अगर यह युद्ध उसने भारत के साथ लड़ा तो वह कई परेशानियों से घिर सकता है।

1962 के युद्ध से भारत ने सबक लिए हैं

चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद के बीच रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को कहा कि भारत ने 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध से सबक हासिल किया है, साथ ही उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय सेनाएं अब किसी भी चुनौती का सामना कर सकती हैं। राज्यसभा में भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ पर आयोजित विशेष सत्र की शुरुआत करते हुए जेटली ने कहा, “1962 में चीन के साथ हुए युद्ध से हमने सबक लिया है कि हमारे सुरक्षा बलों को पूरी तरह तैयार रहना होगा। तैयारियों का परिणाम हमें 1965 और 1971 में देखने को मिला। हमारी सेनाएं मजबूत होती गई हैं।”

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जेटली ने कहा, “कुछ लोग हमारे देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ मंसूबा रखते हैं। लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि हमारे बहादुर सैनिक हमारे देश को सुरक्षित रखने में सक्षम हैं, चाहे चुनौती पूर्वी सीमा पर हो या पश्चिमी सीमा पर।”

उल्लेखनीय है कि 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में भारत को शर्मनाक हार झेलनी पड़ी थी, जबकि 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में भारत ने जीत हासिल की थी, वहीं 1971 में भारत के खिलाफ पाकिस्तान को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी थी और पूर्वी पाकिस्तान अलग होकर स्वतंत्र देश बांग्लादेश बना।

भारत और चीन के बीच मध्य जून से सिक्किम सेक्टर में स्थित डोकलाम को लेकर तनाव की स्थिति चल रही है और चीन लगातार भारत को 1962 जैसी हालत करने की धमकी दे रहा है।

जेटली ने अपने संबोधन में देश के सामने दो तरह की चुनौतियों का जिक्र किया। एक तो वामपंथी चरमपंथ और दूसरा सीमा पर।

उन्होंने कहा, “इन परिस्थितियों में पूरे देश को एकसुर में बोलना चाहिए कि हम कैसे देश के संस्थानों को और मजबूत कर सकते हैं और आतंकवाद के खिलाफ कैसे लड़ सकते हैं।”

जेटली ने कहा कि आतंकवाद देश की अखंडता के लिए बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि इसने एक प्रधानमंत्री (1984 में इंदिरा गांधी) और एक पूर्व प्रधानमंत्री (1991 में राजीव गांधी) की जिंदगियां छीन लीं।

1942 में जब स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन शुरू करने पर उनकी विश्वसनीयता के चलते पूरे देश के आंदोलन में शामिल होने का उल्लेख करते हुए जेटली ने कहा कि लोकसेवकों और संस्थानों की वह विश्वसनीयता अब देखने को नहीं मिलती, जिसे फिर से बहाल करने की जरूरत है।

जेटली ने कहा, “आज के दौर के सबसे बड़े सवालों में लोकसेवकों की सत्यनिष्ठा और विश्वसनीयता है। आज के दिन सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को यह संकल्प लेना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन में और कर विभाग, पुलिस, नगर निगम जैसे सार्वजनिक संस्थानों में जनता की विश्वसनीयता को बहाल किया जाना चाहिए और भय का माहौल खत्म होना चाहिए।”

अप्रत्यक्ष तौर पर आपातकाल का संदर्भ देते हुए जेटली ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र के समक्ष अनेक चुनौतियां आईं, खासकर 70 के दशक में, लेकिन हमारा लोकतंत्र हर चुनौतियों से लड़ता हुआ मजबूत होता गया है।

उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका और विधायिका लोकतंत्र के दो खंभे हैं और उन्हें आपस में उलझने से बचना चाहिए।

जेटली ने कहा, “न्यायपालिका और विधायिका के बीच की लक्ष्मण रेखा की पवित्रता को कायम रखना होगा, जो कई बार धूमिल होती नजर आती है।”

चीनी अखबार की धमकी – “भारत चीन को नज़रअंदाज़ न करे, वर्ना युद्ध होकर रहेगा”

भारत अगर यह सोच रहा है कि डोकलाम में चल रहे सीमा विवाद को लेकर भड़काने के बावजूद चीन कोई प्रतिक्रिया नहीं करेगा तो वह 1962 की तरह एकबार फिर भ्रम में है। चीन के एक दैनिक समाचार पत्र में मंगलवार को प्रकाशित स्तंभ में यह बात कही गई है।

Chinese foreign ministry spokesperson

सरकारी समाचार पत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अपने संपादकीय में लिखा है कि अगर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘चीन की धमकियों‘ को नजरअंदाज करते रहे तो चीन की ओर से सैन्य कार्रवाई की संभावना को टाला नहीं जा सकता।

ग्लोबल टाइम्स का यह संपादकीय भारत से आई उस खबर के जवाब में है, जिसमें कहा गया है कि भारतीय अधिकारियों को विश्वास है कि चीन, भारत के साथ युद्ध का जोखिम नहीं लेगा। ग्लोबल टाइम्स इससे पहले भी 1962 के युद्ध का उदाहरण पेश कर चुका है।

मंगलवार को प्रकाशित संपादकीय में कहा गया है, “भारत ने 1962 में भी भारत और चीन सीमा पर लगातार भड़काने का काम किया था। उस समय जवाहरलाल नेहरू की सरकार को पूरा भरोसा था कि चीन दोबारा हमला नहीं करेगा। हालांकि नेहरू सरकार ने घरेलू एवं कूटनीतिक स्तर पर जूझ रही चीन सरकार की क्षेत्रीय अखंडता को लेकर दृढ़ता को कमतर करके आंका था।”

संपादकीय में आगे कहा गया है, “55 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन भारत सरकार हमेशा की तरह अब भी भ्रम में है। 1962 के युद्ध से मिला सबक वे आधी सदी तक भी याद नहीं रख पाए। अगर नरेंद्र मोदी की सरकार नियंत्रण से बाहर जा रही स्थिति को लेकर दी जा रही चेतावनी के प्रति बेखबर रही, तो चीन को प्रतिक्रिया में कार्रवाई करने से रोकना संभव नहीं हो सकेगा।”

सिक्किम सेक्टर के डोकलाम में करीब दो महीने से बनी तनाव की स्थिति में जरा भी कमी नहीं आई है और दोनों देशों की सेनाओं के बीच गतिरोध जारी है।

चीन की सरकार, चीनी मीडिया और चीन के शीर्ष वैचारिक संगठन लगातार भारत को युद्ध की धमकी देने में लगे हुए हैं।

वहीं डोकलाम सीमा विवाद पर भारत की प्रतिक्रिया नपी-तुली रही है और समस्या के समाधान के लिए भारत हमेशा वार्ता की मांग करता रहा है।

दूसरी ओर बीजिंग का कहना है कि किसी भी तरह की वार्ता तभी हो सकती है, जब भारत डोकलाम से अपनी सेना वापस हटाए।

चीन से कूटनीतिक संपर्क जारी रखेगा भारत : सुषमा स्वराज

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने गुरुवार को कहा कि डोकलाम गतिरोध का ‘परस्पर स्वीकार्य समाधान’ खोजने के लिए भारत चीन के साथ कूटनीतिक माध्यमों से लगातार संपर्क बनाए रखेगा और साथ ही भूटान के साथ समन्वय व परामर्श जारी रखेगा। राज्यसभा में भारत की विदेश नीति पर एक चर्चा का उत्तर देते हुए सुषमा स्वराज ने विशेष तौर पर सिक्किम क्षेत्र के गतिरोध पर टिप्पणी की। स्वराज ने कहा, “चीन के साथ लगी सीमा को अंतिम रूप नहीं दिया गया है और कहा कि बुधवार को चीन द्वारा जारी दस्तावेज में भारत-चीन सीमा से जुड़े मुद्दे पर पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के रुख का चयनात्मक हवाला दिया गया है।”

sushma swaraj speech on china

सुषमा स्वराज ने कहा, “उस पत्र का एक पूर्ण व सटीक विवरण यह भी सामने आया है कि प्रधानमंत्री का दावा स्पष्ट रूप से सीमा रेखा पर आधारित था, जैसा कि हमारे पहले प्रकाशित नक्शे में दिखाया गया है।”

मंत्री ने कहा, “अपने हाल के दस्तावेज में चीनी पक्ष ने भारत-चीन सीमा क्षेत्र में शांति बनाए रखने की प्रतिबद्धता जाहिर की है। भारत का हमेशा मानना है कि भारत-चीन सीमा पर शांति हमारे द्विपक्षीय संबंधों के सुचारु विकास के लिए महत्वपूर्ण शर्त है।”

उन्होंने कहा, “हम कूटनीतिक माध्यमों के जरिए चीनी पक्ष से अस्ताना में अपने नेताओं में हुए सहमति पर पारस्परिक स्वीकार्य हल के लिए लगातार संपर्क जारी रखेंगे। मैंने सदन की भावना को सहयोगात्मक महसूस किया है।”

उन्होंने कहा, “इस संदर्भ में भूटान के साथ पारंपरिक व अद्वितीय दोस्ती बनाए रखते हुए हम भूटान की राजशाही के साथ भी गहन परामर्श व समन्वय बनाए रखेंगे।”

भारत से सैन्य संघर्ष की उलटी गिनती शुरू : चीनी अखबार

चीन के एक समाचार-पत्र ने बुधवार को लिखा है कि भारत और चीन के बीच सैन्य संघर्ष की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है और इससे पहले की देर हो जाए, नई दिल्ली को समझदारी दिखाते हुए डोकलाम से अपने सैनिक वापस बुला लेने चाहिए।

चीन के सरकारी स्वामित्व वाले समाचार पत्र ‘चाइना डेली’ में बुधवार को प्रकाशित संपादकीय में भारत को आगाह करते हुए कहा गया है कि ‘उलटी गिनती शुरू हो चुकी है’।

समाचार पत्र लिखता है, “भारत अगर डोकलाम से अपने सैनिकों को वापस नहीं बुलाता है तो इसका जिम्मेदार वह खुद होगा।”

जून के मध्य में सिक्किम सेक्टर के डोकलाम में सीमा विवाद को लेकर दोनों देशों के सैनिकों के बीच तकरार की स्थिति बनी हुई है और तब से चीनी मीडिया लगातार भड़काऊ लेखों के जरिए भारत को उकसाने और धमकाने में लगा हुआ है।

चाइना डेली अपने संपादकीय में कहता है, “दोनों देशों की सेनाओं के बीच संघर्ष की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। समय लगातार बीतता जा रहा है और ऐसा लग रहा है कि अवश्यंभावी सैन्य संघर्ष को टाला नहीं जा सकेगा। दोनों देशों की सेनाओं के बीच गतिरोध सातवें सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और इसके साथ ही शांतिपूर्ण समाधान के दरवाजे लगभग बंद हो चुके हैं।”

चीन ने भी डोकलाम से अपने सैनिकों को वापस न बुलाने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है। चीन सिक्किम सेक्टर में भारत, चीन और भूटान की तिहरी सीमा से लगे डोकलाम पर अपना अधिकार जताता रहा है और वह इसे डोंगलांग कहता है।

वहीं भारत और भूटान डोकलाम को थिंपू का हिस्सा बताते रहे हैं और भारत ने डोकलाम से दोनों देशों की सेनाएं एकसाथ वापस बुलाने का प्रस्ताव रखा है। हालांकि बीजिंग ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है।

डोकलाम हमेशा चीन के अधिकार क्षेत्र में रहा : मंत्री

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने सोमवार को कहा कि डोकलाम क्षेत्र में कोई क्षेत्रीय विवाद नहीं रहा है। समाचार एजेंसी सिन्हुआ के मुताबिक, मंत्रालय के प्रवक्ता लू कांग ने कहा, “यह कहना सही होगा कि क्षेत्रीय विवाद शांतिपूर्ण तरीके से हल होने चाहिए, लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि इस तरह की बात डोकलाम की हालत पर लागू नहीं होती, क्योंकि इस स्थल पर अब कोई क्षेत्रीय विवाद नहीं है, जहां यह घटना हुई है।”

doklam plateau bhutan

भारत और चीन के जवानों के बीच डोकलाम में गतिरोध बना हुआ है। डोकलाम भारत, भूटान और चीन के बीच तिराहा है। चीन डोकलाम को अपना बताता है, लेकिन भारत और भूटान का कहना है कि यह भूटान का है।

भारत ने जून में चीनी सेना को डोकलाम में सड़क निर्माण करने से रोका। इससे भारत और चीन आमने-सामने आ गए।

लू ने कहा, “चीन भारत सीमा के सिक्किम क्षेत्र का निर्धारण है, जिसे चीन और भारत मान्यता देता है।”

उन्होंने कहा, “चीन-भारत सीमा के परिभाषित सिक्किम क्षेत्र में भारतीय जवानों की अवैध घुसपैठ हो रही है। यह पहले के दोनों पक्षों के बीच गतिरोध से अलग है।”

उन्होंने कहा, “चीन की मंशा चीन-भारत सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने की है, लेकिन चीन अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा।”

उन्होंने कहा कि इस घटना के लिए पूरी तरह से भारतीय पक्ष जिम्मेदार है, और हालात को बढ़ाने से बचने का आग्रह करता है।

भारत ने चीन पर आरोप लगाया है कि वह तिराहे पर यथास्थिति को बदलने का प्रयास कर रहा है और भारत मामले को कूटनीतिक रूप से हल करना चाहता है।

 

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