30,000 लोगो को मौत की नींद सुला सकता है दिल्ली का ज़हरीला धुआँ

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वर्ष 1952, शहर – लंदन; 12000 लोगो की मौत का कारण बना था शहर मे फैला ज़हरीला धुआँ। क्या अब दिल्ली की बारी है?

इतिहास के पन्नो मे झांके तो याद आता है 1952 मे लंदन शहर का वो दृश्य जिसमे पूरा शहर जेहरीले धुएँ की चादर मे ढका हुआ था। रोजमर्रा की तरह लाखो लोग अपने काम के लिए निकल पड़े मगर कुछ बदनसीब ऐसे भी थे जो लौट न सके। जिस धुंए को लोगो ने सामान्य धुआँ समझा उसने कुछ ही समय मे 12,000 लोगो को मौत की नींद सुला दिया और कई हज़ारो लोग इस कारण लम्बे वक़्त तक बीमार रहे, इस धुंध को नाम दिया गया ‘द बिग स्मोक’।

london smog 1952

पिछले हफ्ते एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने लंदन मे फैले वायु प्रदुषण के साथ दिल्ली के खतरनाक प्रदूषण की स्थिति की तुलना की। पर्यावरण विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि यदि गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो दिल्ली को जल्द ही ऐसे वायु प्रदूषण आपदा का सामना करना पड़ सकता है जो लंदन में 65 साल पहले था।

हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना ​​है कि दिल्ली भी ‘द बिग स्मोक’ की तरह दुर्घटना की प्रतीक्षा कर रहा है ताकि शहर की वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए कठोर उपाय किए जा सकें, अन्य लोगों का मानना ​​है कि आपदा पहले ही हमारे ऊपर है और दिल्ली के निवासियों पर इसका स्वास्थ्य प्रभाव लम्बे समय तक रहेगा।

delhi smog

प्रख्यात पर्यावरण विशेषज्ञ सीआर बाबू ने कहा कि आज दिल्ली में हम जिस जेहरीले धुंध का सामना कर रहे है वह लंदन के धुंध से ज्यादा गंभीर है। बाबू ने चेतावनी दी कि अगर सरकार तेजी से काम नहीं करती तो स्थिति बहुत खराब हो जाएगी।

बाबू ने कहा, 1952 मे लंदन मे धुंध के कारण लोगो को साँस लेने मे तकलीफ हुई जिस कारण कई लोगो की मौत हुई मगर दिल्ली की हवा में मौजूद विषाक्त पदार्थों के कारण लंबे समय तक की समस्याएं और पुरानी स्वास्थ्य विकार पैदा हो सकती है जिसका असर शुरू मे भले ही न दिखे मगर बीतते वक़्त के साथ इसके परिणाम गंभीर हो सकते है। यह वायु प्रदूषण आपदाओं को रोकने के लिए दीर्घकालिक योजना के बारे में गहराई से सोचने का समय है।

delhi smog kill 30000 people

एम्स के निदेशक गुलेरिया के अनुसार, शहर में खतरनाक प्रदूषण स्तर पहले से हृदय और श्वसन समस्याओं की शिकायत करने वाले लोगों की संख्या में कम से कम 20 प्रतिशत वृद्धि हो चुकी है।

उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि वर्तमान प्रदूषण के स्तर के कारण अकेले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लगभग 30,000 लोग अपनी जान गंवा सकते हैं। उन्होंने कहा, यह आंकड़ा अस्पताल मे भर्ती हो रहे लोगो के आधार पर दे रहे है।

“मौसम भले ही हमारे नियंत्रण में नहीं है, मगर हम जमीनी स्तर के उत्सर्जन को ज़रूर नियंत्रण कर सकते हैं। हमने अभी तक देखा है कि हर साल हम संकट का सामना करते हैं और तब सरकार प्रतिक्रिया करती है। हमें दीर्घकालिक समाधान की आवश्यकता है।”

“हम जानते हैं कि नवंबर-दिसंबर मे वायु प्रदूषण का स्तर सबसे ज़्यादा होता है इसलिए हमारे एहतियाती उपायों को नवंबर से पहले लागू होना चाहिए। उपायों को अमलीजामा पहनाने के लिए दीवाली की प्रतीक्षा क्यों करनी।”

टीईआरई के क्षेत्र संयोजक आर. सुरेश ने कहा, मुख्य समस्या पड़ोसी राज्यों में खड़ी जलाना, निर्माण और सड़क धूल, गाड़ियों से निकलता जहरीला धुआँ है।

उम्मीद है दिल्ली की सोई हुई केजरीवाल सरकार जल्द ही अपनी कुम्भकर्णी नींद से जागेगी और अपनी राजनीती चमकाने के बजाये दिल्ली के शहरियों को साफ़ हवा दे सकेगी।

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